--%> मोदीराज। कहीं न कहीं डर , भय , अराजकता , अशांति और साम्प्रदियकता का माहौल।

मोदीराज। कहीं न कहीं डर , भय , अराजकता , अशांति और साम्प्रदियकता का माहौल।

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टीम : Noida

Date : Saturday, 28 October, 2017


न्यू खबर, Noida

Updated @: Oct 28 2017 7:35PM

मोदी सरकार किस तरह बोलने की आज़ादी और आंतरिक लोकतंत्र को खत्म कर रही है इसका अंदाज़ा पूर्व नौकरशाहों के हलियाँ बयानों से लगाया जा सकता है।

 

भारतीय स्टेट बैंक (एसबीआई)  की पूर्व चेयरपर्सन अरुंधति भट्टाचार्य ने कहा कि बैंकों को नोटबंदी की तैयारी के लिये और समय दिया जाना चाहिए था। उन्होंने कहा कि नोटबंदी के दौरान बैंकों पर काफी दबाव पड़ा है। अरुंधति ने एक मीडिया कार्यक्रम में कहा, अगर हम किसी नई तरह की चीज़ के लिये तैयार होते हैं, तब यह ज़्यादा सार्थक और बेहतर होता।
उनकी ये टिप्पणी मोदी सरकार की नोटबंदी की तैयारी पर सीधा सवाल उठती है। साथ ही नोटबंदी दौरान बैंकों में पैसे की कमी और इस कारण जनता द्वारा उठाई गई परेशानियों का कारण भी बताती हैं 

जो बड़ा सवाल है वो ये है कि एसबीआई की चेयरपर्सन रहते हुए अरुंधती ने ये बयान क्यों नहीं दिया? क्या उन्हें किसी का डर था? इसी तरह आरबीआई के पूर्व गवर्नर रघुराम राजन ने अपना कार्यकाल ख़त्म होने के एक साल बाद सितम्बर 2017 में नोटबंदी को लेकर चुप्पी तोड़ी।

उन्होंने बताया कि वो नोटबंदी के पक्ष में नहीं थे। कारण बताते हुए उन्होंने कहा कि इस तरह के विघटनकारी फैसले से अल्पावधि में होने वाले नुकसान इसके लम्बी अवधि से होने वाले फायदों से ज़्यादा होंगे।
मोदी सरकार पर आरोप है कि वो नौकरशाहों से लकर मंत्रालय तक तानाशाही रवैय्या अपनाए हुए है। सिर्फ कुछ गिने चुने लोग सरकार में फैसले ले रहे हैं। नौकरशाहों को भी अपना पद गवाने का डर बना हुआ है।
शायद इसीलिए रघुराम राजन और अरुंधती भट्टाचार्य जैसे बड़े पदों पर रहने वाले लोग भी पद पर रहते हुए सरकार मैं रहते सरकार की नीतियों के खिलाफ नहीं बोल रहे हैं और पद छोड़ते ही सब अपने विचार रख रहे हैं। ये सब कहीं न कहीं सरकार के तानशाही रवैये को दर्शाता है और उनके भीतर मौजूद सरकार के डर को भी दिखाता है। 

 

 

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